गुवाहाटी स्थित खानापारा की ताज़ा रिपोर्ट यह है की दो दिन पहले खानापारा स्थित मेघालय साइड में हेडमेन के लिए इलेक्शन होना था, मगर वहां पर वोटिंग के सामान गंडगोल होने के कारन इलेक्शन स्थगित करना पड़ा। हुआ यूँ की वोट केवल जनजाति लोगों को देने के लिए ही नियम बनाया गया था। स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया और नारेबाजी की जिससे मतदान रद करना पड़ा। वहां दो उम्मीदवार मैदान में खड़े हैं। एक पहले से ही उस गाँव में हेडमेन है। उसे टक्कर देने के लिए नया उम्मीदवार मैदान में उतरा जिसका rइस्तेदार पहले से ही उस गाँव में हेडमेन रह चुके हैं।
दरअसल बात यह है की मेघालय में हेडमेन के इलेक्शन में गैर जनजाति लोग मतदान नही कर सकते हैं। खैर! वह बात अलग जब मेघालय बनने से पहले से रह-रहे लोगों को (जिनके पास इलेक्शन कार्ड भी है ) भी यह अधिकार नही दिया गया है। एक और बात गैर जनजाति गाँव (जहाँ ७५% लोग गैर जनजाति ही रहते हैं) वावजूद उन्हें यह अधिकार नही दिया गया है।
समाचार यह है की उस गाँव में एक उम्मीदवार जो पहले से ही वहा हेडमेन है उसने गैर जनजाति लोगों का साथ में लिया है और उन्हें अधिकार देने की बात कहता है। मगर वैसा नही है वह सिर्फ इलेक्शन जितने के लिए गैर जनजाति लोगों में सिर्फ उन ही लोगों का साथ ले रहा है जो नेपल से बिलोंग रखतें हैं। जिनके पास नेपाल का भी सिटिज़न कार्ड भी है। अगर पुराना हेडमेन उस गाँव में रहने वाले जो यहीं के लोकल हैं वैसे लोगों को साथ लेकर चलता तो उसे और सुप्पोर्ट मिलती।
Sunday, October 18, 2009
Thursday, October 8, 2009
फोटो व पेपर कटिंग
ब्लॉग में फोटो हैं उसमे मेघालयपुलिस व भू-माफिया द्वारा लोगों का घर उजारने का दृश्य है।
और पेपर कटिंग में २५ अगस्त २००८ को हुए भू-माफिया और मेघालय पुलिस की ज्यादतियों की पेपर कटिंग hई.
और पेपर कटिंग में २५ अगस्त २००८ को हुए भू-माफिया और मेघालय पुलिस की ज्यादतियों की पेपर कटिंग hई.
Tuesday, October 6, 2009
कैसे मिल रही है लेडी भू-माफिया से धमकी
कैसे मिल रही है लेडी भू-माफिया से धमकी इस पर मैं एक और स्टोरी लिखना चाहता हूँ पाठक वर्ग को यह बताना चाहता हूँ की असम-मेघालय बॉर्डर पर लेडी भू-माफिया भी कितनी सक्रिय हैं. मैंने पहले भी उल्लेख किया है की असम-मेघालय बॉर्डर पर मेघालय की तरफ़ रहने वाले गैर जनजाति लोगों चाहे वहा असमिया हो या नेपाली या बिहारी अथवा बंगाली उन्हें वहां जमीं की रजिस्टर की सुबिधा नही दी गई है चाहे वहा आज़ादी के समय से रह-रहा हो या १९७२ जब असम से मेघालय अलग हुवा था। अब उस क्षेत्र पर जमीं की कीमत असमान चुने लगी है तो शिलांग से आकर जो उस जमीं का मालिक होने का दावा कर उस जमीं को भू-माफिया को बेच देते हैं। और वहां रह-रहे लोगों को भू-माफिया हटाकर उस जमीं पर कब्जा करते हैं। खानापारा जो दिसपुर के कुछ ही फासले पर है। वहां पर कुछ जमीं है जिसपर १९६० से पहले से नेपाली, असमिया, बंगाली, बिहारी लोग रहते हैं उस जमीं को जो अपने आप को उसका मालिक कहने वाले ने उस जमीं की ऊँची कीमत लगाकर वहां रह-रहे लोगों को अग्रीमेंट में खरीदने का दबाव देता है। उसे पता है की इतने दाम में वे उस जमीं को अग्रीमेंट में खरीद नही पाएंगे और उस जमीं को दुसरे को बेच सकें। वैसा ही हुआ वहां रहने वालों ने इतने कीमत में जमीं नही खरीद पाने के कारन उस जमीं को एक लेडी भू-माफिया को बेच दिया। अब उस जमीं पर १९६० से पहले से रह रहे लोगों में एक को उस महिला द्वारा किराये के गुंडे (यहाँ आत्मसमार्पनकारी उल्फा या आत्मसमार्पनकारी बोडो आतंकी) द्वारा धमकियाँ देना और पिटाई करने की बात कहकर डराते हैं। अब यहाँ सवाल यह है की देश की आज़ादी के समय और असम-मेघालय अलग होने से पहले से रहनेवालों को भी भारतवर्ष में रहने का हक़ नही है क्या। क्या उन्हें १९७० से पहले जब वह वहां रहने लगे थे पता था क्या की वह जमीं एक समय में जनजाति क्षेत्र में आएगा और उन्हें वहां से भगा दिया जाएगा। ऊपर मैंने अग्रीमेंट में जमीं खरीदने की बात लिखी है, दरअसल उस क्षेत्र में गैर जनजाति लोगोंत को चाहे वहा १९४७ से पहले से हो या बाद उन्हें जमीं उसी अग्रीमेंट कराकर ५० साल या ९० साल के हिसाब से दिया जाता है। देने वाले सब जानाजाता यानि खासी लोग होते हैं। वे लोग जमीं की ऊँची कीमत देनेवाले मिल जाने पर उन लोगों को बहला-फुसलाकर या धमकी देकर अग्रीमेंट तोड़कर उन्हें बेघर भी करते रहते हैं। वैसा उदाहरण कई देखने को मिल जायेंगे।
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